अगर तुम्हारे भोर-शाम में,
घर से बाहर निकलने पर,
तुम्हे हल्की ठंडी हवा का एहसास हो,
जो कार्यालय - विद्यालयों में,
अवकाशों का आगाज़ हो,
तो समझ जाना कि,
दिवाली आ रही है...
अगर रस्ते पर जाते हुए,
ठक-ठक की आवाज़ आ रही हो,
नए रंगों के डब्बों की सुगंध आ रही हो,
जो रेती, ईंट और मिस्त्री आज मोहल्ले में आते थोड़े ज्यादा दिख रहे हों,
तो समझ जाना की दिवाली आ रही है....
अगर कभी की सबसे नई और महत्वपूर्ण वस्तु,
आज तुम्हें रद्दी - लाचार दिखे,
अगर सबसे बड़ा सत्य,
और जीवन का सार लगे,
लेकिन फिर मोल के आते ही,
सारा सत्य -सार बेकार लगे,
तो समझ जाना, दिवाली आ रही है....
अगर घर में सबकी थकावट,
में खुशी, गर्व और प्यार दिखे,
अगर व्यंजनों के बनने की प्रक्रिया ,
देखकर मुंह से लार बहे,
अगर चखने को दिए गए व्यंजनों की,
खाली क्षणों में थाल दिखे,
तो समझ जाना, दिवाली आ रही है...
शाम को घूमने बाहर जो निकलो,
तो निकली है दुनिया सारी लगे,
चकरी, फुलझड़ी, अनार-दाने,
बम लड़ियों से सजी दुकान बढ़िया लगे,
सोने, चांदी, कपड़े, बर्तनों की,
बिक्री धरातल से उड़े,
तो समझ जाना, दिवाली आ रही है...
काजू किश्मिश सोन-पापड़ी,
के डब्बे हर कदम पर मिले,
मिठाई की दुकानों के बाहर,
हो विभिन्न पंडाल लगे,
भाग - दौड़ के बीच कभी जो,
पैसे गिरने का दर्द मिले,
तो समझ जाना, दिवाली आ रही है....
माटी के बने हुए छोटे,
विभिन्न दिए और आकार मिले,
सजावटी सामान देख कर,
सब आपस में आंखें चार करें,
गरीब से अधिकतम छूट माँगकर,
पूरा मूल्य देना हार लगे,
तो समझ जाना, दिवाली आ रही है....
साल भर से दबी हुई इच्छा,
को जो थोड़ा उभार मिले,
सबको अपनी पसंद के उपहार के लिए,
थोड़ा - थोड़ा सा भाग मिले,
किसी की पसंद के उपहार के लिए,
थोड़ा जो उसके लिए भाग बढ़े,
ये प्यार और दुलार महसूस हो,
तो समझ जाना, दिवाली आ रही है...
जलते छोटे दिए दिखें,
घरों के आंगन और दीवारों पर,
दरवाजों की चौखट पे,
व खिड़की दुकानों पर,
झगमग जलती बल्ब - बत्तियाँ,
दिखे खुशहाली के प्रतीक चारों ओर,
तो समझ जाना, दिवाली आ रही है...